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परन्तु पतरस ने कहा, "हे प्रभु, कदापि नहीं; क्योंकि मैंने कभी किसी साधारण या अशुद्ध वस्तु को नहीं खाया।" तब दूसरी बार उसके पास यह वाणी आई, "जिसे परमेश्वर ने शुद्ध ठहराया है, उसे तू साधारण न कह।" — प्रेरितों के काम 10:14–15

छत पर पतरस को मिला दर्शन उस बन्दीगृह को तोड़ गया, जिसमें वह स्वयं को कैद समझता भी नहीं था। वर्षों तक उसका जीवन सीमाओं के अनुसार चला था—कोशेर और अकोशेर, शुद्ध और अशुद्ध, उचित और निषिद्ध। व्यवस्था एक शिक्षक थी। उसने अपना कार्य किया। उसने लोगों को अलग रखा। परन्तु अलगाव कभी परमेश्वर का अन्तिम उद्देश्य नहीं था। वह केवल मसीह तक पहुँचने का मार्ग था। जब पवित्र आत्मा ने पतरस को स्वर्ग से नीचे उतरती हुई चादर दिखाई, जो उन पशुओं से भरी थी जिन्हें व्यवस्था ने निषिद्ध ठहराया था, तब उसकी पहली प्रतिक्रिया इन्कार की थी। यह विद्रोह नहीं था, बल्कि उसे जो शिक्षा मिली थी उसके प्रति उसकी निष्ठा थी। परन्तु परमेश्वर की वाणी तीन बार आई, "जिसे मैंने शुद्ध ठहराया है, उसे तू साधारण न कह।" परमेश्वर व्यवस्था को रद्द नहीं कर रहा था।