"मैंने यह सीखा है कि जिस दशा में हूँ उसी में सन्तोष करूँ।" — फ़िलिप्पियों 4:11 (BSI)
जब जीवन में सब कुछ अच्छा चलता है, तो प्रसन्न रहना आसान होता है। लेकिन सच्ची शांति तब भी बनी रहती है जब परिस्थितियाँ बिगड़ जाती हैं। प्रेरित पौलुस ने जेल में रहते हुए इस भेद को सीखा। उसका आनंद उसकी सहूलियत या स्वतंत्रता पर निर्भर नहीं था। उसका हृदय पूरी तरह से प्रभु यीशु में स्थिर था। कई लोग अपना पूरा जीवन अगली सफलता की तलाश में बिता देते हैं। वे सोचते हैं कि शांति तब मिलेगी जब उनकी कठिनाइयाँ खत्म होंगी। लेकिन मानव प्रयास कभी स्थायी विश्राम नहीं दे सकता। सच्चा संतोष मानवीय इच्छाशक्ति से नहीं आता। यह अनुग्रह का एक दान है जो यह जानने से आता है कि आप उसमें पहले से ही पूर्ण हैं। यीशु आपके लिए निर्धन बना ताकि आप उसमें धनी हो सकें। क्रूस पर उसने आपकी हर कमी और दुख को अपने ऊपर उठा लिया।