"जिसने हमें नई वाचा के सेवक होने के योग्य भी किया, शब्द के सेवक नहीं पर आत्मा के; क्योंकि शब्द मारता है, पर आत्मा जीवन देती है।" — 2 कुरिन्थियों 3:6 (BSI)
पौलुस ने यह क्यों लिखा, इसे समझने के लिए आपको कुरिन्थ की कलीसिया के माहौल को देखना होगा। वहाँ कुछ ऐसे धार्मिक प्रचारक आ गए थे जो अपनी इंसानी योग्यताओं और व्यवस्था के नियमों का घमंड करते थे और लोगों पर दबाव डाल रहे थे कि परमेश्वर को खुश करने के लिए बाहरी नियमों और पुरानी वाचा की रीतियों का पालन करना ज़रूरी है। पौलुस ने उन्हें सिनाई पहाड़ की याद दिलाई, जहाँ मूसा को पत्थर की तख्तियों पर लिखी व्यवस्था मिली थी। वह व्यवस्था इसलिए मृत्यु लाती थी क्योंकि वह नियम तो देती थी पर उन्हें पूरा करने की आत्मिक ताकत नहीं देती थी। 70 ईस्वी में यरूशलेम के मंदिर के ऐतिहासिक अंत ने हमेशा के लिए साबित कर दिया कि पत्थर के नियम और इंसानी डिग्रियां कभी परमेश्वर की मूल योजना थीं ही नहीं।